23 जुलाई को शहीदों को अक्षराजंलि

रायपुर । छत्तीसगढ़ के जन-जन एवं भारतीय प्रजातंत्र की अस्मिता की सुरक्षा के लिए नक्सली एम्बुश से जूझते-जूझते शहीद हो गये राजनाँदगाँव जिल के पुलिस अधीक्षक श्री विनोद चौबे सहित 29 पुलिस जवानों को राज्य व्यापी श्रद्धांजलि दी जा रही है । इस क्रम में श्री विश्वरंजन, पुलिस महानिदेशक के मार्गनिर्देशन में राज्य के समस्त पुलिस परिवार की ओर से मुख्य श्रद्धांजलि का आयोजन दिनांक 23 जुलाई, 2009 की शाम 6 बजे शहीद स्मारक भवन, जीई रोड़, रायपुर में किया जा रहा है ।

इस आयोजन में समाज के सभी वर्गों के लोगों द्वारा छत्तीसगढ़ के वीर सपूतों को लिखित रूप में श्रद्धांजलि दी जायेगी जिसे पुस्तकाकार रूप भी दिया जायेगा ।

आयोजन में साहित्यिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, आर्थिक, व्यापारिक, स्वास्थ्य, शैक्षणिक, श्रमिक, कर्मचारी व महिला संगठनों के पदाधिकारियों, स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों, नगर निगम पार्षदों, जिला एवं जनपद पंचायत सदस्यों, जिला कार्यालयों के प्रमुखों, वरिष्ठ अधिकारियों, पुलिस कर्मियों सहित आम नागरिकों को आमंत्रित किया गया है ।

पुलिस अब छत्तीसगढ़ी में भी स्वीकार करेगी आवेदन


रायपुर । पुलिस विभाग छत्तीसगढ़ी भाषा में भी आवेदन पत्र स्वीकार करनेवाला राज्य का पहला शासकीय विभाग बन चुका है । छत्तीसगढ़ी राजभाषा को राज्य शासन द्वारा दी जा रही प्राथमिकता और राज्य में उसके व्यवहार करनेवाले अधिसंख्यक आम जनता की सुविधा को मद्देनज़र रखते हुए यह पहल की है पुलिस महानिदेशक श्री विश्वरंजन ने । उन्होंने राज्य के सभी पुलिस महानिरीक्षकों, पुलिस अधीक्षकों को पत्र लिखकर निर्देशित किया है कि किसी भी थाने, पुलिस अनुविभाग अधिकारी, सहित विभाग के सारे कार्यालयों में यदि कोई व्यक्ति अपनी सूचना, शिकायत, एफआईआर आदि राजभाषा छत्तीसगढ़ी (अन्य उपभाषा सहित) एवं देवनागरी लिपि में लिखकर देता है तो उसे अस्वीकार नहीं किया जा सकेगा, न ही उसे हिन्दी में ही लिखकर देने के लिए बाध्य किया जा सकेगा । उन्होंने अपने आदेश में सभी अधिकारियों को यह भी निर्देशित किया है कि जिन अधिकारियों/कर्मचारियों को छत्तीसगढ़ी समझने, पढ़ने में कठिनाई होती है वे अन्य मातहत या स्थानीय छत्तीसगढ़ी भाषा नागरिक की सहायता लेकर ऐसे पत्रों पर आवश्यक रूप से नियमानुसार कार्यवाही करें । पुलिस महानिदेशक ने विभाग के राजभाषा छत्तीसगढ़ी नहीं जानने वाले अधिकारियों एवं कर्मचारियों को धीरे-धीरे छत्तीसगढ़ी भाषा सीखने का भी परामर्श दिया है ताकि भविष्य में आम छत्तीसगढ़ी भाषी नागरिकों को भावनाओं, जानकारियों और सूचनाओं को प्रकट करने में पुलिस प्रशासन के समक्ष कोई कठिनाई न हो ।

नाईजीरियन सायबर अपराधियों को पकड़ने में पुलिस को सफलता

सावधान
जुगुल किशोर की तरह लाखों रूपये न लुटायें - विश्वरंजन

रायपुर । पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन ने राज्य के नागरिकों को सचेत कराया है कि मोबाइल, इंटरनेट ई-मेल के माध्यम से आने वाले संदेशों का विश्वास करके किसी विदेशी लाटरी, ईनाम के लालच में जुगुल किशोर की तरह लाखों रुपये न गँवा बैठे । उन्होंने कहा है कि बड़ी संख्या में विदेशी सायबर अपराधी देश में सक्रिय हैं जो कम पढ़े लिखे और ई-मेल, मोबाइल यूजर्स का पता लगाकर उन्हें ठगने के कई तरीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं । जी, हाँ छत्तीसगढ़, विश्रामपुर का जुगुल किशोर ऐसे ही सायबर अपराध का शिकार हुआ था, जिसमें लिप्त नाईजीरियन अपराधियों को छत्तीसगढ़ पुलिस द्वारा पकड़ लिया गया है । उन्होंने अपील की है कि ई-मेल या मोबाइल संदेश से अचानक मिले ऐसे किसी ईनाम, पुरस्कार के लालच या झाँसे में ना आयें एवं ऐसे संदेहास्पद ई-मेल एवं मोबाइल संदेश आने पर वस्तुस्थिति नजदीक के पुलिस थाने में या पुलिस मुख्यालय के ई-मेल prodgpcg@gmail।com पर सूचित करें ताकि ऐसे लोगों, संस्थाओं का परीक्षण कर ऐसे ठगी से बचाने में सहयोग किया जा सके ।

कहानी कुछ इस प्रकार की है । 13 मार्च, 2009 को जुगुल किशोर सिंह, वल्द श्री सत्यपाल सिंह, निवासी 1/c, विश्रामपुर, जिला कोरिया के मोबाइल नं। 99266-72062 पर आइडिया टावर से एक मैसेज आया कि वे आइडिया सिम खरीदने में लाटरी आपके नाम निकलने पर 4 लाख यूएस डालर जीत चुके हैं । इस संबंध में एक ई-मेल श्री सिंह के मोबाइल पर भेजा गया था, जिसके झांसे पर आकर जुगुल किशोर ने मोबाइल नंबर सहित तुरंत अपना जवाब भेज दिया ।

इसके बाद नेट बेस्ट बैंक यूके के डायरेक्टर Mr। John Bosco Bmegine द्वारा जुगुल किशोर से उसके पुरस्कार की राशि पार्सल से भेजने हेतु पार्सल खर्चा के रूप में 12,760 रुपये की माँग की गई । इस पर श्री किशोर द्वारा मि. जान द्वारा बताये गये एकाउंट नम्बर पर उतनी राशि भेज दी गई । इसके 3 दिन बाद दूसरे व्यक्ति Mr. Johnwhite ने मो. नं. 9873194018 से उसे सूचित किया कि वह पार्सलमैन बनकर भारत आया है तथा कस्टम ड्यूटी क्लियरेंस करने हेतु उसे 2.04 लाख रूपये अलग-अलग एकाउंट नम्बर पर जमा कराने होंगे । इस पर पुनः श्री किशोर द्वारा बताये गये एकाउंट पर 2.04 लाख रूपये जमा कर दिया गया । रुपये जमा होने पर श्री किशोर को पार्सल डिलेवरी लेने हेतु दिल्ली बुलाया गया । श्री किशोर अपने बड़े पुत्र के साथ जब दिल्ली पहुँचे तब उन्हें Mr. Ienis Barister नामक एक नाईजीरियन व्यक्ति मिला जिसने उक्त पार्सल खोलकर दिखाया । उसमें एक काला रंग का यूएस डालर पैक था । उसने श्री सिंह से कहा कि असली रूप में यूएस डालर बनाने हेतु एक केमिकल ज़रूरी है, जिसे खरीदने पर करीब 15 लाख रूपये खर्च होंगे । इसके लिए उसने आईसीआईसीआई, एसबीआई, एक्सिस बैंक के 32 विभिन्न बैंक एकाउंट्स में जमा करने हेतु कहा । विश्वास दिलाने के लिए उसने दो काला रंग के डालर को सेम्पल केमिकल से असली डालर बनाकर बताया । श्री जुगुल किशोर और उसके पुत्र को विश्वास हो जाने पर उन्होंने अपने परिचितों से सहयोग लेकर 15 लाख रूपये बताये गये खातों में जमा कर दिया । इस पर बंद बोतल में उन्हें केमिकल दिया गया जो कुछ घंटो के बाद ही स्वतः टूट गया । इसी तरह तथाकथित Mr. Jenis Barister द्वारा बार-बार केमिकल देने के नाम पर और-और रूपयों की माँग की जाती रही जिसपर जुगुल किशोर द्वारा कुल 18 लाख रूपये देने के बाद भी काला रंगवाला डालर असली डालर में तब्दील नहीं हो सका । इस बीच संबंधितों के द्वारा असली डालर बनाने के नाम पर अधिक रूपयों की माँग की जाती रही ।

अंततः परेशान होकर जुगुल किशोर ने थाना छत्तीसगढ़, कोरिया जिला अंतर्गत विश्रामपुर थाना में 15 मई, 2009 को एफआईआर दर्ज कराया गया । पुलिस द्वारा अपराध क्रमांक 95/09 के तहत आईपीसी धारा 420 के तहत मर्ग कायम किया गया । पुलिस महानिदेशक एवं पुलिस अधीक्षक से मार्गदर्शन लेकर एक विशेष टीम गठित की गई जिसमें प्रभारी एएसआई प्रइमन तिवारी, फिरोज खान को दिल्ली रवाना किया गया । दिल्ली स्थित अंतरराज्यीय अपराध सेल से मिलकर मोबाइल नं. 987319401 धारक को लोकेशन पता किया गया । वह दिल्ली के मोहम्मद पुरा इलाके पर लगातार बना रहना पाया गया । पुलिस दल द्वारा जब जुगुल किशोर के साथ मोहम्मदपुरा इलाके में पतासाजी करने पर मकान नं. एफ-129 में तीन नाईजीरियन नागरिक मिले, जिन्हें देखते ही जुगुल किशोर द्वारा पहचान लिया गया और पंचनामा कर सेलेस्टिन आकोजी, युगोरजी यूजीन, चुकुम निकोलस नामक उन तीनों लाटरी अपराधियों को आईपीसी की धारा 91 के तहत नोटिस देकर उपस्थित कराया गया जिस पर तीनों ने ही लाटरी द्वारा अवैध तरीके से रूपये वसूलने का अपराध स्वीकार कर लिया गया । पुलिस द्वारा इसके साथ ही अपराध में उपयोग में लाये गये कई मोबाइल, कंप्यूटर लैपटाप, पहचान पत्र, पासपोर्ट जप्त कर लिया गया है किन्तु रकम की बरामदगी नहीं हो पाई है । रकम के बारे में आरोपियों द्वारा किसी अन्य व्यक्ति जेनिस द्वारा केन्या लेकर भाग जाने की बात बतायी गयी है । अब बचने के लिए पकड़ाये गये आरोपियों का कहना है कि वे लोग मात्र मोहरा हैं । किन्तु पुलिस द्वारा अपराध विवेचन के दौरान धारा 120 (बी), 34 जोड़कर संबंधित बैंको में संपर्क कर रूपये बरामदगी का प्रयास तेज कर दिया गया है ।

आपदा प्रबन्धन एवं पुलिस


आपदा प्रबन्धन के क्षेत्र में पुलिस की केन्द्रीय भूमिका है। पुलिस निरन्तर कार्य करने वाली संस्था है जिसका नेटवर्क अर्हनिश क्रियाशील रहता है। जब भी कोई आपदा घटित होती है तो इसकी सूचना प्रायः सबसे पहले पुलिस थाने को प्राप्त होती है और सूचना के सम्बन्धित को सम्प्रेषण, विभिन्न चरणों में राहत एवं बचाव कार्य में लगी विभिन्न संस्थाओं को सहयोग, घटना की विवेचना, अतिविशिष्ट लोगों की भ्रमण के दौरान सुरक्षा तथा घटना में प्रभावित व्यक्तियों की चिकित्सा एवं पुनर्वास तक पुलिस समन्वयक की मुख्य भूमिका निभाती है। इसलिए आपदा पुलिस उपमहानिरीक्षक पीएसी, प्रबन्धन में पुलिस द्वारा तैयार कार्ययोजना और उसके क्रियान्वयन के लिए किए गये अभ्यास का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। आपदा प्रबन्धन में पुलिस की भूमिका को अच्छी तरह समझने के पूर्व आपदा के प्रकार, प्रकृति तथा उसके परिणामों के बारे में जानकारी होना आवश्यक है।

आपदा के प्रकार
आपदा को मुख्यतः दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता हैः-
1. प्राकृतिक आपदा
2। मानवजनित आपदा

दोनों ही प्रकार की आपदा में बड़ी संख्या में जनहानि तथा सम्पत्ति को नुकसान पहुँचता है। जहाँ तक प्राकृतिक आपदा का प्रश्न है इसे नियंत्रित करना मुश्किल है क्योंकि प्रकृति पर मानव का कोई नियंत्रण नहीं है। अतः इस प्रकार की आपदा को ईश्वरीय देन मानकर इससे निपटने के लिए कार्ययोजना तैयार की जाती है। प्राकृतिक आपदा भूकंप, बाढ़, सूखा, तूफान, महामारी आदि के रूप में हो सकती है। इसके बारे में न तो कोई पूर्वानुमान लगाया जा सकता है और न ही इसकी विकरालता की जानकारी पूर्व से की जा सकती है। अतः इस प्रकार की आपदा से निपटने के लिए देश में उपलब्ध विभिन्न संस्थाओं के सहयोग से कार्य किया जाता है।

इसके विपरीत मानवजनित आपदा प्रायः मानव भूल या यांत्रिक त्रुटि के कारण होती है जिसमें कभी तो पूर्वानुमान लगाना सम्भव हो पाता है परन्तु कई बार इसका पूर्वानुमान बिल्कुल ही नहीं लगाया जा सकता है। उदाहरणस्वरूप चेरनोविल आणविक दुर्घटना तथा भोपाल गैस त्रासदी जैसी घटनायें अप्रत्याशित थीं जिन्हें दशकों बाद भी नहीं भुलाया जा सकता है। ये पूर्णतया मानव भूल एवं लापरवाही का परिणाम थीं। मानवजनित आपदा को पर्याप्त सावधानी तथा सतर्कता के द्वारा निश्चित रूप से टाला या कम किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त आज के युग में आतंकवाद एवं आतंकी गतिविधियों के कारण पैदा की गयी आपदायें सबसे बड़ी चुनौती के रूप में उभर कर सामने आयी हैं। कुछ मानवजनित आपदाएं निम्नांकित हैं, जैसे- वायु, रेल तथा जलयान दुर्घटना, आग, विस्फोट, भवन गिरने की घटना, औद्योगिक दुर्घटना, आतंक एवं सामूहिक नरसंहार युद्ध आदि।

आपदा प्रबन्धन एवं पुलिस
आपदा प्रबन्धन के क्षेत्र में प्रारम्भिक कार्यवाही प्रायः स्थानीय प्रशासन एवं आकस्मिक सेवा प्रदाता संस्थाओं के द्वारा प्रदान की जाती है, हालांकि इसमें कई संस्थाएं शामिल हो सकती हैं। इसके लिए आकस्मिक सेवा प्रदाता संस्थाओं को निरन्तर तैयारी की अवस्था में रहने की आवश्यकता रहती है ताकि आवश्यकता पड़ने पर बिना किसी विलम्ब के आवश्यक सहायता प्रदान की जा सके। ऐसी सभी संस्थाओं को ऐसी व्यवस्था करके रखना चाहिए ताकि सूचना मिलने पर अविलम्ब उसे क्रियाशील किया जा सके।

पुलिस को इस प्रकार की घटना की जानकारी प्रायः सबसे पहले प्राप्त होती है। अतः पुलिस को सूचना मिलते ही तुरन्त मौके पर पहुँचकर घटना के विषय में विस्तृत तथ्यात्मक जानकारी प्राप्त करके घटना के सम्बन्ध में जिम्मेदार अधिकारियों एवं संस्थाओं को सूचना का संप्रेषण करना, घटनास्थल पर मौजूद साक्ष्य को संरक्षित रखना, घायलों को चिकित्सा सुविधा उपलब्ध करवाना तथा क्षेत्र में फंसे लोगों को वहाँ से सुरक्षित स्थानों पर ले जाने का कार्य करना पड़ता है। यद्यपि इस कार्य में अग्निशमन सेवा, चिकित्सालय, अन्य सरकारी तथा गैर-सरकारी संस्थाएँ सम्मिलित रहती हैं परन्तु इनके बीच समन्वय स्थापित करने की प्रारंभिक जिम्मेदारी पुलिस की ही होती है। स्थानीय प्रशासन के स्तर पर विभिन्न संस्थाओं के कार्य को सुचारु रूप से संचालित करने के लिये जिला एवं कमिश्नरी स्तर पर कार्ययोजना तैयार की जानी चाहिये जिसमें विभिन्न संस्थाओं के ढांचे एवं कार्य तथा उनके उत्तरदायित्व का स्पष्ट उल्लेख हो ताकि आवश्यकतानुसार सभी एजेन्सियां एवं संस्थायें प्रभावी कार्यवाही कर सकें। इस तरह की कार्ययोजना रहने पर जनहानि तथा सम्पत्ति के नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

उपरोक्त कार्य को सुचारु रूप से सम्पन्न करने के लिये प्रत्येक जिला पुलिस को अपने पास आपदा पुस्तिका (Disaster Manual) तैयार करके रखना चाहिये जिसमें निम्नलिखित सूचनायें हों-
1. विभिन्न प्राकृतिक एवं मानवजनित आपदा का विवरण।
2. आपदाओं के बारे में अफवाहें, जिन्हें दूर किया जाना होता है।
3. स्थानीय प्रशासन जैसे-म्यूनिसपल, पंचायत के अधिकारियों के विषय में जानकारी।
4. गांव, वार्ड, सेक्टर आदि का मानचित्र व विवरण।
5. स्थानीय प्रशासन के पदाधिकारियों का उत्तरदायित्व।
6. गैर-सरकारी संगठनों की सूची तथा उनके पदाधिकारियों के नाम।
7. आपदा प्रबंधन के लिये सरकारी धन की व्यवस्था तथा अन्य स्रोतों के विषय में जानकारी।
8. स्वैच्छिक संस्थाओं की भूमिका।
9. विभिन्न स्तरों पर प्रदान किये जाने वाले प्रशिक्षणों का विवरण।
10. समय-समय पर जागरूकता पैदा करने हेतु किये जाने वाले प्रदर्शन एवं अभ्यासों का विवरण।
11. विभिन्न संस्थाओं के बीच समन्वय।
12। अभिलेखीकरण।

आकस्मिक कार्ययोजना तैयार किया जाना
आकस्मिक कार्ययोजना में निम्न विवरण विस्तार से अंकित किये जाने चाहिये ताकि समय-समय पर स्थानान्तरण के उपरान्त पुलिस कर्मियों को आपदा प्रबंधन के लिये पर्याप्त मार्गदर्शन प्राप्त हो सकेः-
1. क्षेत्र की भौगोलिक जानकारी, (क्षेत्र की बनावट (Topography)।
2. जलवायु।
3. जनसंख्या तथा उसकी संरचना, जाति, लिंग व धर्मवार।
4. उद्योग व व्यापार।
5. प्राकृतिक एवं मानवजनित आपदा
इसके अंतर्गत क्षेत्र में घटित प्राकृतिक एवं मानवजनित आपदाओं का इतिहास विस्तार से अंकित किया जाना चाहिये।
6. नेतृत्व
1. शासन का ढांचा तथा विभिन्न स्तर के पदाधिकारियों की शक्ति एवं उनका उत्तरदायित्व।
2. कमाण्ड।
3. आवश्यक सेवा प्रदाता संस्था की सेवाओं की भूमिका।
4. आकस्मिक एवं अन्य सेवा संस्थायें।
4.1. चेन ऑफ कमाण्ड।
4.2. पता एवं टेलीफोन नम्बर।
4.3. अग्नि शमन, जलापूर्ति, चिकित्सा, यातायात, रेलवे, टेलीफोन, रेडक्रास सोसायटी, सिविल डिफेंस आदि संस्थाओं तथा गैर-सरकारी संगठनों को इस सूची में शामिल किया जाये।
7. सूचना प्राप्त करने तथा उसके संप्रेषण की व्यवस्था।
8. कण्ट्रोल रूम की स्थापना।
9. विभिन्न संस्थाओं से सम्बन्ध रखने वाले
पदाधिकारियों के नाम एवं टेलीफोन नम्बर।
10. घटनास्थल पर की जाने वाली व्यवस्था।
10.1. प्रत्येक संस्था/विभाग के उत्तरदायित्व एवं कार्य का अभिलेखीकरण की जाने वाली व्यवस्था।
10.2. मौके पर पहले उपस्थित होने वाले पुलिस अधिकारी के लिये दिशा-निर्देश।
10.3. नियंत्रण कक्ष, स्टाफ, जाँचकर्ता अधिकारी तथा पर्यवेक्षणकर्ता अधिकारियों के उत्तरदायित्व।
10.4. संबंधित विभाग को सूचना देना।
10.5. चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराना तथा प्राथमिक चिकित्सा केन्द्रों को सूचना देना।
10.6. जीवित बचे लोगों के लिये कैम्प की स्थापना।
10.7. घटना में मृत व्यक्तियों की पहचान हेतु अस्थाई मर्चरी की स्थापना।
10.8. क्षेत्र को खाली कराना।
10.9. यातायात ट्रैफिक की व्यवस्था।
10.10. सम्पत्ति की सुरक्षा।
10.11. शांति व्यवस्था बनाये रखना।
10.12. घटना की सूचना पर आने वाले वी.आई.पी. की सुरक्षा।
10.13. घटना स्थल पर मीडिया को सही तथ्यों की जानकारी देने के लिये नोडल अफसर की नियुक्ति।
10.14. मीडिया के लिये लाईजन अफसर की नियुक्ति।
10.15. संचार व्यवस्था स्थापित करना।
11. जनसाधारण को दी जाने वाली सूचना
11.1. लाउड-स्पीकर की व्यवस्था।
11.2. सही एवं स्पष्ट सूचना का प्रसारण।
11.3. रेडियो एवं टेलीविजन पर प्रसारण हेतु सही तथ्यों का संप्रेषण।
12. बचाव कार्य।
13. मलवा हटाने का कार्य।
14. शिक्षा का प्रशिक्षण।
14.1. स्वयंसेवकों तथा स्वैच्छिक संगठनों एवं सरकारी कर्मचारियों को आवश्यतानुसार प्रशिक्षण की व्यवस्था।
14.2. शैक्षिक संगठन-आपदा निवारण में स्वैच्छिक संगठनों की तैयारी, अनुभव एवं योग्यता का लाभ लेना।
15. आकस्मिक कार्ययोजना का पूर्वाभ्यास एवं प्रदर्शन- समय-समय पर विभिन्न एजेन्सियों एवं मीडिया को साथ लेकर इस प्रकार के अभ्यास एवं प्रदर्शनी आयोजित करनी चाहिये ताकि कार्ययोजना के बारे में शामिल लोगों, कर्मचारियों एवं संस्थाओं के साथ-साथ आमजन में भी जागरूकता आ सके।
16। कार्ययोजना का मूल्यांकन- समय-समय पर आकस्मिक कार्ययोजना का मूल्यांकन किया जाना चाहिये तथा उसमें अंकित सूचनाओं को अद्यावधिक किया जाना चाहिये।

पुलिस की भूमिका एवं कार्यक्षेत्र
1. भीड़ नियंत्रण-विभिन्न प्रकार की आपदाओं के विगत अनुभव से पाया गया है कि किसी घटना के होने पर जिज्ञासावश बड़ी संख्या में लोग घटनास्थल की ओर पहुँचना शुरू कर देते हैं जिससे राहत कार्य में बाधा आती है, साथ ही महत्त्वपूर्ण साक्ष्यों के नष्ट होने का भी खतरा रहता है। अतः ऐसी स्थिति में उस क्षेत्र में भीड़ नियंत्रण हेतु पुलिस व्यवस्था की जानी चाहिये।
2. यातायात व्यवस्था-घटना में घायल व्यक्तियों को अस्पताल तक ले जाने तथा ले आने एवं विभिन्न सेवा प्रदाता एजेन्सियों की पहुँच घटनास्थल पर हो सके, इसके लिये आवश्यक है कि सुचारु यातायात व्यवस्था की जाये। घटनास्थल से चिकित्सालय तथा अन्य सेवा प्रदाता संस्थान, जैसे- अग्शिमन सेवादल, रेलवे स्टेशन, बस अड्डों के बीच समानान्तर यातायात व्यवस्था बनायी जानी चाहिये ताकि ट्रैफिक के कारण कोई रुकावट पैदा न हो सके। ट्रैफिक व्यवस्था के बारे में लाउडस्पीकर, रेडियो एवं टी.वी. आदि के द्वारा प्रचार-प्रसार किया जाना चाहिये।
3. क्षेत्र की तलाशी एवं उसे खाली कराया जाना-प्रायः घटनास्थल पर पुलिस ही सबसे पहले पहुँचती है। अतः उस समय घायल व्यक्तियों को तत्काल अस्पताल पहुँचाया जाना चाहिये तथा क्षेत्र को खाली कराये जाने की व्यवस्था की जानी चाहिये ताकि अन्य आवश्यक सेवा प्रदाताओं को परेशानी न हो। हानिकारक पदार्थ, विस्फोटक, ज्वलनशील वस्तु, जिससे दुर्घटना की संभावना हो, उसे पर्याप्त सावधानी के साथ हटाया जाना चाहिये। क्षेत्र को खाली कराये जाने अथवा आवश्यकतानुसार यदि घर के अंदर लोगों को रहने की अनुमति दी जाती है तो इस तरह की घोषणा पुलिस के द्वारा ही स्थिति के आवश्यक मूल्यांकन के उपरांत लाउडस्पीकर से करनी चाहिये।
4. सम्पत्ति की सुरक्षा-घटना के बाद प्रायः आपराधिक तत्व चोरी, लूट-पाट आदि की घटनाओं में लिप्त हो जाते हैं। अतः पुलिस को चाहिये कि लोगों की सम्पत्ति की सुरक्षा के लिये तत्काल आवश्यक प्रबन्ध करे तथा आवश्यकतानुसार पुलिस कर्मचारियों की नामवार ड्यूटी लगायी जाये ताकि आम जनता की सम्पत्ति की सुरक्षा हो सके।
5. घटना की आपराधिक विवेचना-यदि आपदा के पीछे कोई आपराधिक कारण परिलक्षित हो तो पुलिस को इस विषय में तत्काल प्रथम सूचना अंकित कर विवेचना शुरू करनी चाहिये। इसके लिये खोजी कुत्ते, बम डिस्पोजल स्क्वाड तथा फोरेंसिक विशेषज्ञों को घटनास्थल पर आने की सूचना तत्काल दी जानी चाहिये। घटना की गंभीरता एवं महत्ता को देखते हुए विवेचना के लिये पुलिस
अधिकारियों की विभिन्न टीमें तत्काल गठित की जानी चाहिये। इस दौरान उपलब्ध लोगों के साक्ष्य, उन व्यक्तियों की वीडियो रिकार्डिंग, घटनास्थल पर उपलब्ध भौतिक साक्ष्य आदि को एकत्रित कर लेना चाहिये। यदि गिरफ्तारी की आवश्यकता हो तो आवश्यकतानुसार गिरफ्तारी की जानी चाहिये तथा नियमानुसार अन्य वैधानिक कार्यवाही सुनिश्चित की जानी चाहिये।
6. नियंत्रण कक्ष की स्थापना-घटना के तत्काल बाद सूचनाओं के आदान-प्रदान, प्रेस एवं मीडिया को तथ्यों की सही जानकारी देने तथा अफवाहों को शांत करने के उद्देश्य से एक वृहद नियंत्रण कक्ष की स्थापना की जानी चाहिये। इसमें आवश्यकतानुसार आम आदमी, मीडिया तथा बचाव कार्य में लगी विभिन्न एजेन्सियों के बीच समन्वय स्थापित करने के लिये अलग-अलग उप नियंत्रण काउण्टर्स लगाये जाने चाहिये। इन काउण्टर्स पर जिम्मेदार एवं सहनशील पुलिसकर्मी तैनात किये जाने चाहिये जो विभिन्न भाषाओं की जानकारी रखते हों, संवेदनशील हों तथा अपने कार्य को सुचारु रूप से सम्पन्न करने के लिये पूर्व में परखे जा चुके हों। इनके पास घटना की अद्यतन जानकारी तथा घायल/मृतकों के विषय में विस्तृत विवरण निरंतर उपलब्ध कराया जाना चाहिये ताकि सही सूचना का आदान-प्रदान हो सके। इन नियंत्रण उपकेन्द्रों के लिये निर्धारित टेलीफोन नम्बरों को रेडियो, टी.वी. एवं अन्य संचार के माध्यमों से जन-साधारण को उपलब्ध कराया जाना चाहिये तथा पर्याप्त संख्या में टेलीफोन पर सूचना उपलब्ध कराने हेतु पुलिसकर्मी तैनात किये जाने चाहिये। नियंत्रण कक्ष में अभिलेखीकरण पर विशेष बल दिया जाना चाहिये और यदि संभव हो तो वहाँ प्राप्त होने वाली एवं दी जाने वाली सूचना को रिकार्ड किया जाना चाहिये। इन घटनाओं के बाद होने वाली विभिन्न प्रकार की न्यायिक एवं अन्य जाँचों में इस तरह के अभिलेखों के उपलब्ध होने पर काफी सुविधा होती है।
7. वी.वी.आई.पी./वी.आई.पी. भ्रमण-आमतौर पर बड़ी घटनाओं के तत्काल बाद राजनैतिक कारणों से विभिन्न विशिष्ट महानुभावों तथा अन्य राजनैतिक व्यक्तियों का तुरन्त आगमन शुरू हो जाता है, ऐसी स्थिति में न सिर्फ उनकी सुरक्षा बल्कि शांति-व्यवस्था की गंभीर समस्या भी उत्पन्न हो जाती है। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिये कि इन महानुभावों की सुरक्षा के लिये अलग से पुलिस अधिकारी एवं कर्मचारियों की ड्यूटी लगायी जाये। राहत एवं बचाव कार्य में लगे हुए पुलिस कर्मियों को इस कार्य से अलग रखा जाना चाहिये क्योंकि यदि उन्हें महानुभावों की सुरक्षा तथा राहत कार्य की दोहरी जिम्मेदारी दी जायेगी तो वे किसी भी कार्य को जिम्मेदारी के साथ निभा नहीं पायेंगे। प्रयास यह किया जाना चाहिये कि इस तरह के भ्रमण से राहत एवं बचाव कार्य में बाधा न उत्पन्न होने पाये। इस सम्बन्ध में पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों को महानुभावों से व्यक्तिगत रूप से सम्पर्क करके उन्हें यथासम्भव जनहित में भ्रमण स्थगित करने हेतु अनुरोध भी करना चाहिये। यदि पर्याप्त पुलिस उनकी सुरक्षा हेतु उपलब्ध नहीं है तो ऐसे महानुभावांें को भ्रमण की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
8. मृतकों एवं घायलों की शिनाख्त-मृतकों एवं घायलों की शिनाख्त हेतु एक अलग पुलिस टीम बनायी जानी चाहिये जो उनकी फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी तथा उनसे सम्बन्घित सूचनाओं को तरतीबवार संकलित कर उनके चिकित्सा के स्थान, पोस्टमार्टम एवं अन्तिम संस्कार आदि का पूरा रिकार्ड रखे। मृतकों की शिनाख्त करने वाले व्यक्तियों का पूरा विवरण, शव को प्राप्त करने वाले व्यक्तियों का फोटोग्राफ तथा उनका विवरण अच्छी तरह तैयार करना चाहिये, क्योंकि कई बार इस तरह की आपदाओं के बाद घोषित होने वाली सहायता राशि को प्राप्त करने के लिये अनधिकृत व्यक्ति, मृतक को अपना रिश्तेदार बताकर धन लेने का प्रयास करते हैं तथा मृतकों के नाम, पते गलत दर्ज करा दिये जाते हैं जिससे बाद में कई कानूनी पेचीदगियाँ पैदा हो जाती हैं। अतः घायलों तथा मृतकों की शिनाख्त तथा घटनास्थल से अस्पताल, राहत केन्द्र, मर्चरी तथा उनके अंतिम संस्कार स्थल तक स्पष्ट छायांकन तथा अभिलेखीकरण किया जाना चाहिये।
9. स्वागत केन्द्र-आमतौर पर ऐसा देखा गया है कि बड़ी दुर्घटनाएं या बम विस्फोट आदि के उपरांत बड़ी संख्या में दूर-दराज क्षेत्रों में घायल तथा मृतकों के रिश्तेदार एवं बड़ी संख्या में लोग अपने परिजनों के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिये एकत्रित होते हैं जिनको सही जानकारी देने तथा इनके ठहरने के लिये स्वागत केन्द्रों की स्थापना की जानी चाहिये, जैसे-इनके बैठने, खाने-पीने आदि की व्यवस्था करायी जानी चाहिये। इनको वांछित सूचना नियंत्रण कक्ष के माध्यम से उपलब्ध करायी जानी चाहिये। स्वैच्छिक संगठनों के स्वयं सेवकों को इनके सहायतार्थ लगाया जाना चाहिये जो किसी पुलिस अधिकारी के मार्गदर्शन में कार्य करें।
10. विदेशियों के बारे में सूचना-यदि किसी विदेशी नागरिक की घटनास्थल में घायल या मृत्यु होती है तो पुलिस को चाहिये कि उसके सम्बन्ध में विस्तृत सूचना वियना कन्वेंशन में दिये गये प्राविधानों के अनुसार सम्बन्धित देश के दूतावास को यथाशीघ्र उपलब्ध करा दी जाये।

200 अधिकारियों ने कागज को नोट में बदलना सीखा


रायपुर । 1 और 2 मार्च को पुलिस विभाग द्वारा संपन्न अंधश्रद्धा निर्मूलन कार्यशाला में राज्य भर के 200 से अधिक पुलिस उप अधीक्षकों, निरीक्षकों, हवलदारों, चिकित्सकों, वकीलों, विज्ञान शिक्षकों ने रंगकर्मियों, साहित्यकारों, पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं ने नंगे पाँव दहकते अंगारों पर चलना सीखा । इसके अलावा इन सभी स्वयंसेवी मास्टर्स ट्रेनरों ने हवा में आग लगाने, नारियल से चावल, बाल आदि निकालने, कोरे कागज़ पर आकृति बनाने, गले से तलवार आर-पार करना, कागज़ को नोटों में तब्दील करना, किसी भी तस्वीर से भभूत निकालना आदि कई दर्जनों ऐसे हाथ सफाई और ट्रिक्स को प्रेक्टिकल कर सीखा जिसकी आड़ में ढ़ोंगी एवं शातिर बदमाश लोग सीधी-सादी जनता को ठग कर आर्थिक अपराधों को अंजाम देते हैं । ये प्रशिक्षक अब अपने-अपने जिलों के अनुविभाग, थाने और गाँवों के लिए कम से कम 20 हजार विशेष ट्रेनर्स प्रशिक्षित करेंगे जो ऐसे अपराधों पर रोकथाम के लिए प्रशिक्षित होंगे ।

छत्तीसगढ़ पुलिस की पहल का अनुकरण बिहार और महाराष्ट्र में भी
छत्तीसगढ़ पुलिस द्वारा शुरू किया गया सामाजिक, वैज्ञानिक एवं प्रगतिशील चेतनामूलक अभियान देश भर में अनूठा है । यह देश के सभी राज्यों की पुलिस प्रशासन के लिए रोल मॉडल बनेगा । बिहार अल्पसंख्यक आयोग के सदस्य भंते बुद्धप्रकाश और देश भर में अंधविश्वास आधारित सामाजिक अपराधों के खिलाफ़ मुहिम चलाने वाली संस्था अखिल भारतीय अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के राष्ट्रीय कार्याध्यक्ष व वरिष्ठ पत्रकार श्री उमेश चौबे ने छत्तीसगढ़ पुलिस द्वारा संचालित अभियान की कार्ययोजना को बिहार एवं महाराष्ट्र सरकार एवं पुलिस द्वारा लागू कराने का विश्वास जताया है । वे पुलिस महानिदेशक श्री विश्वरंजन की विशेष पहल से प्रारंभ किये गये अंधश्रद्धा आधारित अपराधों को हतोत्साहित करने के लिए संचालित अभियान की पहली कार्यशाला में सम्मिलित होने रायपुर आये थे। श्री चौबे ने छत्तीसगढ़ मॉडल की भूरि-भूरि प्रंशसा करते हुए इसे सभी राज्यों में लागू कराने के लिए स्वयं पहल की बात कही ।
पुलिस अधिकारियों के लिए विशेष प्रशिक्षण पाठ्यक्रम बनेगा ।

पुलिस महानिदेशक श्री विश्वरंजन की खास पहल से विभाग द्वारा अंधविश्वास के कारण होने वाले अपराधों की रोकथाम के लिए संचालित सामाजिक अभियान को अब व्यापक रूप दिया जा रहा है । पूरे राज्य में अंधविश्वासों से मुक्त होकर वैज्ञानिक सोच के प्रसार के लिए सामाजिक सहभागिता का वातावरण बनाने की व्यापक रणनीति के अंतर्गत छत्तीसगढ़ पुलिस टोनही प्रताड़ना अधिनियम एवं औधषि और जादूई उपचार (आपत्तिजनक विज्ञापन) अधिनियम आदि कानूनों का कड़ाई से पालन कराने के लिए अब अपने विभाग के सभी फ़ील्ड अधिकारियों एवं कर्मचारियों को विशेष तौर पर प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित किया जायेगा ।

अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (प्रशिक्षण) श्री गिरधारी नायक के मार्गनिर्देशन में पुलिस विभाग के सभी प्रशिक्षु पुलिस उप अधीक्षकों, सहायक उपनिरीक्षकों को विशेष तौर पर प्रशिक्षित किया जायेगा। इसके अलावा सभी जिलों में पुलिस प्रशिक्षण स्कूलों में भी नव नियुक्त आरक्षकों और हवलदारों को भी सेवाकालीन प्रशिक्षण के दौरान प्रशिक्षित किया जायेगा ताकि वे सेवाकाल में बेझिझक अंधश्रद्धा से उत्पन्न अपराधों की रोकथाम कर सकें । इसके लिए सबसे पहले अंधश्रद्धा निर्मूलन एवं वैज्ञानिक सोच विकसित करने वाले देश के विशेषज्ञों की सहायता से विभाग के लिए राज्य स्तरीय प्रशिक्षक तैयार किया जा रहा है जो विभाग में सभी स्तरों पर प्रशिक्षण देंगे । इसके लिए विशेष पाठ्यक्रम भी बनाया जा रहा है ।

प्रशिक्षु अधिकारियों को अंधश्रद्धा निर्मूलन कानूनों का प्रशिक्षण
पुलिस मुख्यालय द्वारा संचालित अभियान के अंतर्गत दूसरे चरण में छत्तीसगढ़ पुलिस अकादमी चंदखुरी में प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे 44 नव पुलिस उप अधीक्षकों और लगभग 300 सहायक उप निरीक्षकों को फ़ील्ड में पदस्थी से पूर्व ही अपराधों को प्रोत्साहित करने वाले अंधविश्वासों से लड़ने के लिए दक्ष बनाया जायेगा ताकि वे कानूनी प्रावधान यथा औषधि और जादू उपचार(आपत्तिजनक विज्ञापन) अधिनियम-1955,भारतीय दंड संहिता(धारा 420 एवं अन्य), छत्तीसगढ़ में विशेष तौर पर लागू टोनही प्रताड़ना निवारण अधिनियम-2005 के पालन को सुनिश्चित कर सकें जिससे महिलाओं की सामाजिक प्रताड़ना, आर्थिक शोषण, ठगी आदि पर लगाम कसा जा सके ।

अंधविश्वास आधारित अपराधों के नियंत्रण हेतु अभियान – एक नज़र


विश्वरंजन
पुलिस महानिदेशक, छत्तीसगढ़

अभियान क्यों ?
ग्रामीण एवं आदिवासी अंचलों में निरक्षरता, परंपरागत सोच और तद्-केंद्रित जीवन दृष्टि, तर्क आधारिक मानसिकता के अभाव, वैज्ञानिक सत्यता की जानकारी के अभाव में आज भी कई तरह की अवैधानिक, अमानवीय व असामाजिक अंधविश्वास प्रचलित हैं । इनमें टोनही, डायन, झाड़-फूँक की आड़ में ठगी, धन दोगूना करने की चालाकियाँ, गड़े धन निकालना, शारीरिक, मानसिक आपदाओं को हल करने के लिए गंडे ताबीज, चमत्कारिक पत्थर एवं छद्म औषधियों का प्रयोग कर धन कमाना आदि प्रमुख हैं । इसके परिणाम स्वरूप महिला प्रताड़ना एवं हिंसा, धोखेबाजी से धन उगाही, चिकित्सा वर्जना के कारण असमय मृत्यु की घटनाओं की संभावना बढ़ जाती हैं, जो समाज के साथ-साथ पुलिस एवं कानून व्यवस्था के लिए चुनौतियाँ खड़ी करती हैं।

वर्तमान में अंधश्रद्धा के कारण समाज में उत्पन्न होनी वाली चुनौतियों और दुष्परिणामों की रोकथाम के लिए कई तरह के कानून प्रावधान भी लागू हैं यथा -औषधि और जादू उपचार (आपत्तिजनक विज्ञापन) अधिनियम -1955,भारतीय दंड संहिता ( धारा 420 एवं अन्य), छत्तीसगढ़ में विशेष तौर पर टोनही प्रताड़ना निवारण अधिनियम-2005 आदि । इसके बावजूद कानूनी प्रावधानों के व्यापक प्रचार-प्रसार का अभाव, सामाजिक एवं स्वयंसेवी हस्तक्षेप एवं पहल की कमी अंधविश्वास से उपजीं कई बड़ी ऐसी घटनाओं की सूचना पुलिस या प्रशासन तक पहुँच ही नहीं पाती जो मूलतः अवैधानिक एवं अमानवीय प्रकृति की होती हैं । इसमें ग्रामों में बैगा-गुनिया आदि के प्रभावी-पांरपरिक पकड़ जैसी नकारात्मक भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है । इन वैगाओं के प्रभाव एवं स्वयं ऐसे अंधश्रद्धा से ग्रसित होने के कारण ग्राम कोटवार भी ऐसे संभावित हादसाओं की गोपनीय सूचना पुलिस थानों में देने से बहुधा कतराते हैं । ऐसे में, इन संवेदनशील मुद्दों पर घटना के पूर्व औऱ घटना के बाद भी सम्यक कार्यवाही करने में पुलिस कमजोर हो जाती है ।

निष्कर्ष यही कि ऐसे अंधविश्वास न केवल निराधार एवं अवैज्ञानिक हैं बल्कि ये कई तरह अवैधानिक, असामाजिक, अमानवीय अपराधों के कारण भी हैं । ये अंधविश्वास पुलिस के समक्ष निरंतर कानूनी कार्यवाहियों की संभावना को कई कोणों से प्रोत्साहित करते हैं । एक ओर जहाँ, ऐसे अंधविश्वासों की आड़ में अपराध कारित होते हैं, दूसरी ओर ऐसे अपराधों को पारंपरिक मूल्यों के अनुरूप वैध ठहराकर गाँवों के प्रभु वर्गों द्वारा पुलिस को इससे दूर रखा जाता है ।

अतः इन परिस्थितियों के निपटने के लिए एवं अंधविश्वास के समूल निवारण हेतु सचेत एवं तत्पर कानूनी कार्यवाही के साथ-साथ एक सामाजिक अभियान भी आवश्यक है जिसे स्वयंसेवी आधार पर संचालित किया जा सकेगा ।

अभियान का लक्ष्य –
- राज्य में टोनही प्रथा के कारण होने वाले अपराध के दर को शून्य पर लाना ।
- राज्य में पुलिस विभाग के फील्ड अधिकारियों का उन्मुखीकरण ।
- राज्य में टोनही आदि अंधविश्वासों के बरक्स सामाजिक वातावरण तैयार करना ।
- टोनही आदि अपराधिक प्रवृति के खिलाफ मानव संसाधन को प्रशिक्षित कर दक्ष बनाना ।
- राज्य के सभी ग्रामों में टोनही सहित अंधविश्वास के खिलाफ वैज्ञानिक चेतना का प्रसार ।
- अपराधिक प्रवृति वाले अंधविश्वासों की रोकथाम के लिए कारगर सूचना नेटवर्क बनाना ।

अभियान की अवधि एक वर्ष ( 1 मार्च 2009 से 29 फरवरी 2010 )

अभियान की रूपरेखा –
राज्य स्तरीय पुलिस टास्क फ़ोर्स का गठन –
राज्य भर में टोनही आदि प्रचलित अंधविश्वासों को केवल कानूनी या पुलिस कार्यवाही से नियंत्रित नहीं किया जा सकता । इसके लिए चरणबद्ध और समयबद्ध स्वयंसेवी अभियान अधिक कारगर होगा, जिससे ऐसी अंधविश्वासों के ख़िलाफ सामाजिक वातावरण तैयार किया जा सके । इस अभियान का क्रियान्वयन राज्य स्तर पर गठित राज्य पुलिस टास्क फ़ोर्स द्वारा किया जायेगा। राज्य पुलिस टास्क फ़ोर्स के पदेन अध्यक्ष पुलिस महानिदेशक होंगे । राज्य स्तरीय पुलिस टास्क फ़ोर्स अभियान हेतु रणनीतियों का निर्धारण, संचालन, समीक्षा, मानिटरिंग, प्रोत्साहन, प्रेरणा एवं वांछित सहयोग उपलब्ध कराने का कार्य करेगा । यह टास्क फ़ोर्स पुलिस मुख्यालय में एक प्रकोष्ठ की तरह कार्य करेगा । इस टास्क फ़ोर्स में प्रमुख, राष्ट्रीय सेवा योजना प्रमुख, रेड क्रास सोसायटी, स्वयंसेवी चिकित्सक, शिक्षाविद, सामाजिक कार्यकर्ता, विज्ञान-शिक्षक, रंगकर्मी, साहित्यकार एवं वरिष्ठ संपादक, महिला संगठनों की कार्यकर्ता आदि, जो स्वयंसेवी भाव से धीरे-धीरे जुड़ते जायेंगें, सम्मिलित हो सकेंगे । इस टास्क फोर्स में पुलिस अधिकारियों के अलावा उन स्वयंसेवी युवाओं को भी रखा जायेगा जो पूर्व में ऐसे किसी सामाजिक जन जागरण अभियानों में संबंद्ध रहे हों ।

जिला स्तरीय पुलिस टास्क फ़ोर्स का गठन –
जिले भर में अभियान के संचालन के लिए जिला स्तर पर एक पुलिस टास्क-फ़ोर्स का गठन किया जायेगा, जिसके पदेन अध्यक्ष संबंधित पुलिस अधीक्षक होंगे । यह टास्क फ़ोर्स जिला पुलिस कार्यालय में एक प्रकोष्ठ की तरह कार्य करेगा । इस प्रकोष्ठ को कार्यालयीन एवं अन्य आवश्यक संसाधन पुलिस अधीक्षक द्वारा उपलब्ध कराया जा सकेगा । इस टास्क फ़ोर्स का गठन पुलिस अधीक्षक करेंगे जिसमें प्रमुख रेडक्रास सोसायटी, स्वयंसेवी चिकित्सक, सामाजिक कार्यकर्ता, विज्ञान शिक्षक, शिक्षाविद्, रंगकर्मी, साहित्यकार एवं पत्रकार, महिला संगठनों की कार्यकर्ता आदि होंगे । इस टास्क फोर्स में अनिवार्यतः उन युवाओं को भी रखा जाये जो पूर्व में ऐसे किसी सामाजिक जन जागरण अभियानों में संबंद्ध रहे हों । (ऐसे सदस्य कों किसी भी राजनीतिक दल का अक्रिय या सक्रिय सदस्य नहीं होना चाहिए । ) पुलिस अधीक्षक द्वारा जिला स्तरीय पुलिस टास्क फ़ोर्स के नियमित कार्यों को एक समन्वयक द्वारा संपादित किया जायेगा जिसका चयन पुलिस अधीक्षक द्वारा जिला मुख्यालय में पदस्थ विभाग किसी योग्य एवं स्वयंसेवी अधिकारी में से किया जा सकेगा, जो अपने कार्यों के अलावा उक्त अभियान को गति देने में पुलिस अधीक्षक को सहयोग देंगे ।

अनुविभागीय/थाना स्तरीय पुलिस टास्क फोर्स का गठन –
अनुविभाग में आने वाले गाँवों में अभियान संचालन के लिए अनुविभागीय स्तर पर एक पुलिस टास्क-फ़ोर्स का गठन जिला पुलिस टास्क फोर्स की तरह किया जायेगा, जिसके पदेन अध्यक्ष संबंधित अनुविभागीय अधिकारी, पुलिस होंगे । यह टास्क फ़ोर्स अनुविभागीय अधिकारी, पुलिस कार्यालय में एक प्रकोष्ठ की तरह कार्य करेगा जिसे कार्यालयीन एवं अन्य आवश्यक संसाधन अनुविभागीय अधिकारी, पुलिस के द्वारा उपलब्ध होगा । इसी तरह थाना स्तर पर पुलिस टास्क फ़ोर्स का गठन पुलिस अधीक्षक के मार्गनिर्देशन संबंधित थानेदार करेंगे । इन निचली इकाईयों में भी जिला स्तरीय टास्क फ़ोर्स की तरह स्वयंसेवी युवाओं को सम्मिलित किया जायेगा । ये टास्क फ़ोर्स अपने अपने क्षेत्रों में अभियान का क्रियान्वयन, संचालन, समीक्षा, मानिटरिंग एवं प्रोत्साहन कार्य करेगें।

टास्क फ़ोर्स के कार्य –
- अपने क्षेत्र में प्रचलित टोनही सहित ऐसे अन्य अंधश्रद्धाओं की पहचान करना जो कानूनी के समक्ष अवैधानिक या अप्रिय स्थितियों की संभावनाओं को बढ़ावा देती हैं ।
- प्रत्येक अंधश्रद्धा के समूल निराकरण हेतु वातावरण निर्माण के लिए अधिकतम् संभावित सामाजिक, सांस्कृतिक, प्रशासनिक, वैधानिक, शैक्षिक चिकित्सागत पहलों का आंकलन, क्षेत्र की वास्तविकताओं के अनुरूप रणनीतियों का निर्धारण एवं उनका चरण बद्ध ढंग से सम्यक क्रियान्वयन ।
- क्षेत्र में वैज्ञानिक यथार्थ, सामाजिक चेतना, कानूनी प्रावधानों, तर्काश्रित आस्था एवं विश्वास को प्रोत्साहित करने वाली गतिविधियों का आयोजन, प्रचार-प्रसार एवं प्रोत्साहन एवं ऐसी स्वयंसेवी संगठनों को सहयोग।
- अभियान की नियमित मासिक समीक्षा बैठकों का आयोजन, आगामी गतिविधियों के संचालन हेतु दिशाबोध, नयी परिस्थितियों, अनुभवों, संभावनाओं के आधार पर नये कारगर क़दमों का निर्धारण ।
- अभियान क्रियान्वयन हेतु आवश्यक संसाधनों तथा उसकी पूर्ति के लिए जिलों में उपलब्ध एवं संभावित विभिन्न प्रकार के वांछित तथा उपयुक्त शासकीय/अशासकीय/सामाजिक/सांस्कृतिक/स्वयंसेवी ट्रस्टों, संगठनों के संसाधनों का सम्यक आकलन, संपर्क एवं दोहन (उदाहरण के तौर पर, टोनही प्रथा वाले ग्रामों में स्वास्थ्य विभाग द्वारा उपचार शिविर, चिकित्सा परामर्श, ट्रिक्स एवं वैज्ञानिक सत्यों के प्रदर्शन के प्रशिक्षकों हेतु साक्षरता समिति से कार्यकर्ताओं का चिन्हाँकन, पंचायत विभाग के माध्यम से पंचायती राज कार्यकर्ताओं का उन्मुखीकरण, चौपालों तथा ग्रामसभाओं में परामर्श, समाज कल्याण विभाग से कलापथक कलाकार, स्वयंसेवी कार्यकर्ता आदि)
- वैज्ञानिक ट्रिक्स का प्रशिक्षण, प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं ग्रामों में प्रायोगिक प्रदर्शन, कला जत्थों का आयोजन, बौद्धिक सभाओं का चरणबद्ध आयोजन, स्थानीय भाषा में कानूनी प्रावधानों का पोस्टर एवं पांप्लेट निर्माण कर ग्रामों के चौपालों में चस्पाकरण ।
- सभी प्रकार की मीडिया (आकाशवाणी, टीव्ही चैनलों, प्रिंट मीडिया, प्रबुद्ध साहित्यकारों, नृत्य मंडलियों, रामायण मंडलियों, धार्मिक संस्थाओं के प्रमुख आदि) का व्यापक समर्थन प्राप्त करना।
- टोनही एवं ऐसे अंधश्रद्धा केंद्रित कुरीतियों को रोकने में सर्वोत्कृष्ट एवं कारगर भूमिका निभाने वाले पुलिस कर्मी, स्वयंसेवी कार्यकर्ताओं, अधिकारियों का चिन्हांकन 26 जनवरी, 15 अगस्त आदि महत्वपूर्ण अवसरों पर सार्वजनिक सम्मान एवं पुरस्कार।
- टोनही, टोना, जादूगरनी आदि के कथित आरोप से पीड़ित परिवार, महिला-पुरुष का गोपनीय सूचना एकत्र करना, उन्हें घटना पूर्व पूर्ण कानूनी सहयोग एवं उनके सामाजिक बचाव के लिए सभी उपायों का सतर्क अनुप्रयोग
- अंधश्रद्धा फैलाकर समाज में अवैज्ञानिक, अमानवीय, असामाजिक वातावरण बनाने वाले तथा द्रव्य एवं रूपये कमाने वाले धूर्त बैगा, गुनिया, टोनहा की गोपनीय सूची तैयार करना । उन्हें टास्क फोर्स की निचली इकाइयों के द्वारा समझाइस देना । ऐसे ग्रामों में ( खासकर हाट बाजार के दिन भी )वैज्ञानिक ट्रिक्स से प्रशिक्षित टीम द्वारा प्रदर्शनों का आयोजन सुनिश्चित करवाना ।
- इसके अलावा जिला टास्क फोर्स अपने स्तर पर आपसी विचार-विमर्श से अन्य कार्यों, रणनीतियों का निर्धारण कर सकेगा ।

वैज्ञानिक चेतना के प्रसार हेतु स्वयंसेवी युवकों का चयन एवं प्रशिक्षण –
वैज्ञानिक चेतना के प्रसार, टोनही एवं अन्य अंधविश्वासों की वास्तविकता से परिचित कराने, उसके आधार पर टोने-टोटकों के छद्मों का पर्दाफाश करने हेतु प्रत्येक स्तर पर प्रशिक्षित स्वयंसेवी युवकों की एक टीम होगी । यह त्रिस्तरीय टीम राज्य, जिला फोर्स, अनुविभाग/थाना स्तरीय टास्क फोर्स के संयोजन में कार्य करेगी । विशेष तौर पर यह टीमें पुलिस टास्क फ़ोर्स के मार्गनिर्देशन में गाँवों में वैज्ञानिक चेतना हेतु प्रायोगिक प्रदर्शन करेंगी। इन स्वयंसेवियों को कई दशकों से कार्यरत नागपुर की स्वयंसेवी संस्था अखिल भारतीय अंधश्रद्धा निवारण समिति द्वारा प्रशिक्षित किया जा सकेगा । इन्हें प्रशिक्षित कराने का उत्तरदायित्व एवं आवश्यक संसाधन पुलिस राज्य/जिला/अनुविभागीय पुलिस टास्क फोर्स मुहैया करायेगी ।
राज्य स्तर पर –
राज्य स्तर पर 25 मुख्य स्त्रोत प्रशिक्षकों होंगे । ऐसे मुख्य स्त्रोत प्रशिक्षकों का चयन पुलिस महानिदेशक द्वारा राज्य पुलिस टास्क फोर्स के संयोजन में किया जायेगा । ये सभी ऐसे युवा चिकित्सक, स्वयंसेवी संगठनों के युवा कार्यकर्ता, पुलिस विभाग के योग्य अधिकारी, विज्ञान प्रचारक, पत्रकार आदि हो सकते हैं, जिन्हें स्वयंसेवी आधार पर यह प्रशिक्षण दिया जा सकेगा तथा ये आवश्यकतानुसार अन्य स्तर पर आवासीय प्रशिक्षण का आयोजन एवं अंधविश्वास के निवारण की मानिटरिंग आदि कार्यों में स्वतः स्फूर्त होकर अपना योगदान दे सकेंगे ।

जिला स्तर पर-
जिला स्तर पर 10-10 मास्टर पर्सन्स होंगे । ऐसे मास्टर ट्रेनर्स का चयन जिला पुलिस अधीक्षक द्वारा जिला पुलिस टास्क फोर्स के संयोजन में किया जायेगा । ऐसे मास्टर्स ट्रेनर्स का चयन स्वयंसेवी आधार पर कार्य करने वाले सामाजिक संस्थाओं के समर्पित युवा कार्यकर्ता, सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं इच्छुक पुलिस कर्मियों में से ही किया जा सकेगा । इन्हें राज्य स्तर पर आयोजित 2-2 दिवसीय आवासीय प्रशिक्षण कार्यशाला में प्रशिक्षित किया जायेगा । इस तरह से कुल 190 मास्टर ट्रेनर्स जिलों के लिए तैयार होंगे । जो ग्राम्य स्तर पर चयनित 1-1 युवाओं को जिला स्तर पर आयोजित प्रशिक्षण कार्यशाला में प्रशिक्षित करेंगे एवं उनके साथ मिलकर जिलों के सभी गाँवों में टोनही सहित अन्य प्रचलित अंधविश्वासों के निर्मूलन में पुलिस की मदद करेंगे ।

अनुविभागीय स्तर पर-
प्रत्येक अनुविभागीय अधिकारी, पुलिस अपने अधीन थानों के अंतर्गत अनुविभाग स्तर पर भी 10-0 ट्रेनरों का चयन करेंगे जिन्हें राज्य स्तर पर प्रशिक्षित एवं जिला स्तर के मास्टर ट्रेनर्स प्रशिक्षित करेंगे । ऐसे अनुविभाग स्तरीय ट्रेनर्स का चयन अनुविभागीय पुलिस टास्क फोर्स के संयोजन में स्वयंसेवी आधार पर कार्य करने वाले सामाजिक संस्थाओं के समर्पित युवा कार्यकर्ता, सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं इच्छुक पुलिस कर्मियों में से ही किया जा सकेगा । अनुविभाग स्तर के ऐसे ट्रेनर्स जिला स्तरीय ट्रेनर्स के साथ अनुविभाग के अंतर्गत आने वाले थानों के अधीन प्रत्येक ग्रामों से 1-1 स्वयंसेवी, वैज्ञानिक चेतना पर विश्वास करने वाले शिक्षित युवाओं को उन आवासीय प्रशिक्षण कार्यशाला में प्रशिक्षित करने में मदद करेंगे, जो थाना स्तर पर होगा ।

थाना स्तर पर –
प्रत्येक ग्राम से 1-1 स्वयंसेवी कार्यकर्ता होंगे । ऐसे प्रत्येक स्वयंसेवी कार्यकर्ता का चयन अंतिम रूप से थानेदार थाना स्तरीय टास्क फोर्स के संयोजन से कर सकेंगे । ग्राम वार नामों का लिखित प्रस्ताव कोटवार एवं प्रधान अध्यापक प्राथमिक शाला या माध्यमिक शाला देंगे । ऐसे स्वयंसेवी कार्यकर्ता का चयन करते वक्त कोटवार एवं प्रधान अध्यापक सुनिश्चित करेंगे कि वह न्यूनतम (आदिवासी क्षेत्रों में) आठवीं उत्तीर्ण हो, या अधिकतम मेट्रिक उत्तीर्ण हो । उसे सामाजिक कायों पर निःस्वार्थ और बिना पारिश्रमिक के अपने गाँव के सामाजिक उत्थान के लिए विश्वास हो । उसे विज्ञान पर विश्वास हो और वह टोनही आदि अंधविश्वास के ख़िलाफ़ कार्य करने की रूचि रखता हो । चूंकि अनुविभागीय स्तर पर ग्रामों की संख्या अधिक होगी अतः यह प्रशिक्षण थाना स्तर या विकास खंड स्तर पर होगा ।

इस तरह से राज्य के प्रत्येक ग्राम के लिए एक स्वयंसेवी युवा को प्रशिक्षित किया जायेगा जो अपने स्तर पर अंधविश्वास के निवारण के लिए न केवल वैज्ञानिक चेतना का संचार करेंगे बल्कि ग्राम स्तर पर ऐसे तत्वों को समझाइस भी देने में सक्षम हो सकेंगे। ऐसे स्वयंसेवियों से अपेक्षा भी रहेगी कि वे ऐसी संभावित घटनाओं की पूर्व सूचना भी सीधे थानेदार को दे सकेंगे । इनके चिन्हांकन के लिए थानेदार/पुलिस उप अधीक्षक/पुलिस अधीक्षक द्वारा प्रशिक्षणोपरांत संतुष्ट होने पर परिचय पत्र भी दिया जा सकेगा ।

पुलिस विभाग की कार्यप्रणाली के दृष्टिकोण से भविष्य में ऐसे युवकों को (उनकी सामाजिक भूमिका के स्तर पर योग्यता और प्रदर्शन पर विचार करते हुए) अन्य राष्ट्रीय एवं प्रादेशिक महत्व के विषयों पर भी संसूचना हेतु उपयोग मे लाया जा सकता है, ताकि ऐसी आसन्न समस्याओं का पूर्व आंकलन किया जा सके जो पुलिस विभाग के लिए ज़रूरी हों । जैसे नक्सली समस्या, जुआ, जाली नोट का प्रचलन, शराब एवं मादक द्रव्यों का अवैध व्यापार आदि ।

अभियान के अंतर्गत वर्ष भर जिलों में विभिन्न गतिविधियाँ
01. पुलिस विभाग के फील्ड अधिकारियों, थानेदारों का उन्मुखीकरण ।
02. यथासंभव सभी ग्रामों में एक बार वैज्ञानिक ट्रिक्स प्रदर्शन, बौद्धिक सभा का आयोजन ।
03. कोटवार द्वारा प्रत्येक माह गाँव भर में टोनही निरोधक कानून आदि की मुनादी करना ।
04. कोटवार द्वारा कथित टोनही और बैगा आदि की गोपनीय सूची थानों को सौपना ।
05. प्रत्येक ग्रामों में पोस्टर, पाम्पलेट का वितरण एवं चौपालों पर चस्पा करना ।
06. कला जत्था दल द्वारा प्रमुख ग्रामों में जन जागरण अभियान हेतु प्रस्तुति ।
07. थानेदार द्वारा पंचायत के सहयोग से घटना संभावित ग्रामों में समझाईस बैठकों का आयोजन ।
08. ग्राम पंचायतों द्वारा हर ग्राम में टोनही विरोधी बैठक एवं ग्राम सभाओं का आयोजन ।
09. माननीय मुख्यमंत्री द्वारा जिला, जनपद, ग्राम पंचायत प्रमुखों को अपील पत्र जारी करना ।
10। त्रिस्तरीय पंचायत के अध्यक्षों, विधायकों, धार्मिक संस्थाओं के प्रमुखों की ओर से अपील
11। मुख्य सचिव की बैठक में कलेक्टरों को ऐसे अभियान मे संपूर्ण सहयोग का दिशाबोध देना ।
12. स्कूलों द्वारा टोनही एवं अंधविश्वास विरोधी रैलियों, प्रभात फेरियों, प्रतियोगिताओं का आयोजन ।
13. प्रत्येक जिले में एनसीसी/एनएसएस द्वारा ग्रामों में शिविरों का आयोजन ।
14. कृषि विभाग किसान मेलों में व सभा आयोजित कर टोनही विरोधी कानून की जानकारी देना ।
15. नेहरू युवा केंद्र को अभियान के लिए प्रेरित करना एवं उन्हें टास्क सौपना ।
16. आँगन बाड़ी केंद्रों में महिलाओं को ऐसी कुरीतियों के विरूद्ध सशक्त करने की वार्षिक रणनीति तैयार कर कार्य करना ।
17. मीडिया के सभी माध्यमों को उत्प्रेरित कर दोहन ।
18. टोनही आदि अंधविश्वासों के कारण होने वाले अपराधों के दर को शून्य पर लाना ।
19. उच्च प्रदर्शन करने वाले स्वयंसेवी अधिकारियों, कार्यकर्तोओं का सम्मान ।

अभियान हेतु निर्धारित समय-सारिणी
01. राज्य टास्क फ़ोर्स का गठन, बैठक, कार्ययोजना निर्धारण- 28 फरवरी, 2009
02. जिला टास्क फ़ोर्स का गठन, बैठक, कार्ययोजना निर्धारण- 5 फरवरी, 2009
03. अनुविभागीय टास्क फ़ोर्स का गठन, बैठक, कार्ययोजना निर्धारण- 10 फरवरी, 2009
04. थाना टास्क फ़ोर्स का गठन, बैठक, कार्ययोजना निर्धारण- 10 फरवरी, 2009
05. ग्राम स्तर पर स्वयंसेवी कार्यकर्ताओं का चयन – 28 फरवरी, 2009
06. राज्य स्तर पर वैज्ञानिक ट्रिक्स प्रशिक्षण कार्यशाला – 1-2 मार्च, 2009
07. जिला स्तर पर वैज्ञानिक ट्रिक्स प्रशिक्षण कार्यशाला – 10-12 मार्च, 2009
08. अनु. स्तर पर वैज्ञानिक ट्रिक्स प्रशिक्षण कार्यशाला– 20-21 मार्च, 2009
09. थाना स्तर पर वैज्ञानिक ट्रिक्स प्रशिक्षण कार्यशाला– 25-26 मार्च, 2009
10. राज्य में अंधविश्वास निवारण अभियान का शुभांरभ – 1 अप्रैल, 2009
11. अभियान के अंतर्गत विभिन्न गतिविधियों का संचालन – 31 मार्च, 2010 तक
(टीपः- आवश्यकतानुसार अभियान की अविधि बढ़ायी जा सकेगी)

अंधविश्वासजनित अपराध रोकने पुलिस तैयार करेगी 20 हज़ार स्वयंसेवी कार्यकर्ता

पुलिस तैयार करेगी 20 हज़ार स्वयंसेवी कार्यकर्ता - विश्वरंजन
हर ग्राम से एक कार्यकर्ता होंगे तैयार

रायपुर । सामाजिक अपराध और अमानवीय गतिविधियों को प्रोत्साहित करने वाले प्रचलित अंधविश्वासों से प्रदेश को मुक्त करने के लिए राज्य के हर गाँव से एक-एक कार्यकर्ता को छत्तीसगढ़ पुलिस प्रशिक्षित करने जा रही है । ये प्रशिक्षित कार्यकर्ता अपने-अपने गाँव में पांरपरिक रूप से प्रचलित अंधविश्वासों, जैसे इनमें टोनही, डायन, झाड़-फूँक की आड़ में ठगी, धन दोगूना करने की चालाकियों, गड़े धन निकालने, शारीरिक, मानसिक आपदाओं को हल करने के लिए गंडे ताबीज, चमत्कारिक पत्थर एवं छद्म औषधियों का प्रयोग कर धन कमाने आदि गतिविधियों, घटनाओं के पीछे की जाने वाली चालाकियों एवं ट्रिक्स की वैज्ञानिक व्याख्या कर प्रायोगिक प्रदर्शन कर जनजागरण करेंगे । ज्ञातव्य हो कि पुलिस महानिदेशक श्री विश्वरंजन की विशेष सामाजिक पहल पर छत्तीसगढ़ पुलिस ने वर्ष 2009 में टोनही प्रकरणों की दर को शून्य पर स्थिर करने तथा अंधविश्वास आधारित अपराधों के नियंत्रण हेतु विशेष अभियान प्रारंभ किया है ।

पुलिस महानिदेशक ने बताया कि राज्य में संचालित इस अभियान में लगभग 20,000 (बीस हज़ार) स्वयंसेवी कार्यकर्ता प्रशिक्षित होकर अंधविश्वासजनित अपराधों को रोकने में प्रमुख भूमिका निभायेंगे । प्रथम चरण में 19 जिलों से चयनित 200 जिला स्त्रोत प्रशिक्षकों को देश-विदेश में वैज्ञानिक तरीकों से अंधश्रद्धा उन्मूलन के लिए प्रसिद्ध संस्था नागपुर एवं पटना की सामाजिक संस्था द्वारा दो दिवसीय प्रशिक्षण रायपुर में दिलाया जायेगा । ये जिला स्त्रोत प्रशिक्षक पुलिस अधीक्षक एवं जिला टास्क फ़ोर्स के अध्यक्ष द्वारा चयनित पुलिस अधिकारी एवं स्वयंसेवी कार्यकर्ता होंगे । द्वितीय चरण में ये 200 प्रशिक्षित जिला स्त्रोत प्रशिक्षक 19 जिलों के प्रत्येक अनुविभाग स्तर पर 10-10 प्रशिक्षकों को प्रशिक्षित करेंगे । ये अनुविभाग के अंतर्गत आने वाले पुलिस कर्मी, सामाजिक कार्यकर्ता, महिला संगठन के सदस्य, कलाकार, समाजसेवी होंगे ।
अनुविभाग स्तर पर प्रशिक्षित ट्रेनर्स अपने अनुविभाग के अधीन सभी थानों के अंतर्गत आने वाले प्रत्येक ग्राम से 1-1 स्वयंसेवी कार्यकर्ता को दक्ष करेंगे । ये स्वयंसेवी कार्यकर्ता ग्राम कोटवार, युवा/महिला संगठन के सदस्य, लोक कलाकार आदि होंगे जिनका चिन्हाँकन थानेदार द्वारा किया जायेगा । इस तरह से कुल 19744 अर्थात् 20,000 कार्यकर्ता वैज्ञानिक चेतना, ट्रिक्स एवं उन चालाकियों से ग्रामीणों को परिचित करायेंगे ताकि टोनही आदि कई अंधविश्वासों से अपराधों को बल न मिले । इसके अलावा प्रत्येक मेले, मडई, शिविरों आदि में वैज्ञानिक ट्रिक्स से अंधविश्वास के बचने के लिए विशेष आयोजन भी करेंगे ।
ये प्रशिक्षित स्वयंसेवक कार्यकर्ता विशेष तौर पर टोनही, डायन के साथ-साथ अंधश्रद्धा के दुष्परिणामों की रोकथाम के लिए कई तरह के प्रावधानित कानून जैसे - औषधि और जादू उपचार (आपत्तिजनक विज्ञापन) अधिनियम 1955, भारतीय दंड संहिता ( धारा 420 एवं अन्य), तथा छत्तीसगढ़ में विशेष तौर पर टोनही प्रताड़ना निवारण अधिनियम-2005 आदि की जानकारी भी गाँव-गाँव में देंगे, ऐन वक्त पर अपराधों को रोकने के लिए पुलिस को संसूचित करेंगे ताकि अनहोनी और अप्रिय घटनाओं, अपराधों समय रहते ही को टाला जा सके ।